सवाल पूछना गुनाह क्यों हो गया? ??
सवाल पूछना गुनाह कैसे हो गया ???
सवाल पूछना गुनाह क्यों हो गया?
मतलब, वह भी क्या दौर था—जब सवाल पूछना तारीफ़ नहीं, बल्कि काबिलियत की निशानी हुआ करता था। असहमति को सुनने का साहस था और सच बोलने वाले की बात को महत्व दिया जाता था।
लेकिन आज ऐसा दौर आ गया है, जहाँ एक सच बोलते ही स्थानीय स्तर से लेकर जिला स्तर तक कई बड़े लोगों को मिर्ची लगने लगती है। कहीं सात साल से पद पर बने रहने की चिंता है, कहीं कुर्सी जाने का डर और कहीं चुनाव का सामना करने के बजाय चुनावी प्रक्रिया से ही दूरी बनाए रखने के रास्ते तलाशे जाते हैं।
विडंबना यह भी है कि स्थानीय स्तर पर अलग-अलग नगरों में हुए चुनावों में जिला नेतृत्व की मौजूदगी और सक्रियता दिखाई देती है। लेकिन जब बात स्वयं जिला अध्यक्ष पद के चुनाव की आती है, तो वही चुनावी प्रक्रिया सवालों के घेरे में क्यों दिखाई देती है?
यह किसी व्यक्ति पर आरोप नहीं, बल्कि संगठन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर उठता एक स्वाभाविक सवाल है।
कुर्सी पर बैठे लोग सवालों से बच सकते हैं, चुनाव से दूरी बना सकते हैं, लेकिन सच बोलने वालों को तत्काल ‘अनुशासनहीन’ करार देने में देर नहीं लगती।
आखिर लोकतंत्र की ताकत सवाल पूछने में है या सवालों से बचने में?
शायद आज समस्या सवाल पूछने वालों से नहीं, बल्कि उन लोगों से है जिन्हें सवालों के जवाब देने की आदत नहीं रही।
सवाल पूछना गुनाह नहीं, अधिकार है—और सवालों का जवाब देना नेतृत्व की जिम्मेदारी।
जल्द हि अगली कहानी मे पढ़िए जिलाध्यक्ष ने कैसे किया ज़िले मे फुट डालो और राज करो नीति का इस्तमाल
